
Zindagi Ko Zindagi Pukarti
Kavya Sanghrah
About the Book
मेरा यह कविता संग्रह आपके सम्मुख प्रस्तुत है। “ज़िंदगी को ज़िंदगी पुकारती” इसमें जीवन के ढेरों आयाम दर्शाये हैं। कुछ मधुर एहसास कुछ बाहरी एहसास जो कि दुनिया के हैं। मेरी कविताओं में मैंने वो सब कहना चाहा है जो मुझे दिखा, महसूस हुआ और लिख दिया। “मिटे हैं अरमान सारे, हो गये खामोश तारे।” “तारे” कविता क
मेरा यह कविता संग्रह आपके सम्मुख प्रस्तुत है। “ज़िंदगी को ज़िंदगी पुकारती” इसमें जीवन के ढेरों आयाम दर्शाये हैं। कुछ मधुर एहसास कुछ बाहरी एहसास जो कि दुनिया के हैं। मेरी कविताओं में मैंने वो सब कहना चाहा है जो मुझे दिखा, महसूस हुआ और लिख दिया। “मिटे हैं अरमान सारे, हो गये खामोश तारे।” “तारे” कविता का सार। ऊँची उड़ानों से आहत घायल पंछी की पीड़ा “गरम आँसुओं की” कविता में दिखायी देगी। “अपनी छाया” कविता में कवयित्री ने खुद को अपनी एक परछाई मात्र समझ लिया है, जो थक गई है। “निजी उत्तरदायित्व” में कवयित्री ने मनुष्य को अपने कर्मों का जिम्मेदार ठहराते हुए बड़े सटीक और संक्षिप्त शब्दों में उसकी खीझ को प्रस्तुत किया है।
मेरे प्रिय पाठकों आपके हृदय में उमड़ने-घुमड़ने वाली घटाओं को उद्वेलित कर देंगी मेरी यह छोटी-छोटी-सी कविताएँ। कृपया मुझे अपने विचारों से अवश्य ही अवगत करायें। आपके सामने प्रस्तुत हूँ मैं.....।
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